गाँव में त ओइसहीं लाइन के अकाल पड़ल रहेला। गाँव-गाँव में बिजली के खंभा त गड़ि गइल बा अउर साथे-साथे तारो दउरा के गाँव की बाहर ट्रांस्फार्मरो बइठा देहल गइल बा पर इ बिजुरी ससुरी त नदारदे रहेले। ए बिजुरी ससुरिया के आँखि-मिचउरी खेलले में ना जाने केतना मजा आवेला कि एकबेर आपन दाँत देखा के लुका जाले त कई-कई दिन ले लुकाइले रहेले।
हम आपन झुँझलाहट के के बताईं। बाप रे बाप किरकेट के विस्व कप सुरु हो गइल बा अउर इ लाइन बुजरी एइसन बिया की आवते नइखे। का करीं, किरकेट देखे कहाँ जाईं कुछ समझ में नइखे आवत।
सबेरहीं-सबेरहीं बिछवना पर से उठते, दिमागे में इहे तमाम बाति सोंचत हम गाँव में चल देहनी। सोंचनी की सायद गाँव में अउर कुछ किरकेट देखवइया (अरे कुछ का पूरा गँउवें त किरकेट के दिवाना बा) से मिली के किरकेट बहके न पावे एइसन वेवस्था क लेहल जाव। अरे भाई आजु भारत के मैच बा।
रास्ता में रमेसर काका मिली गइने अउर हमके देखते बोलि पड़ने, "टुन्ना बाबू, अरे भाई तूँ त बहुत पढ़ाई पढ़ले बाड़S, सुनेनी की इए-बिए पास हउअS।" रमेसर काका के बाति सुनि के हम तनि झुँझला गइनी अउर बीचहीं में उनकर बाति काटि के कहनी की काका साफ-साफ बतावS न, का काम बा। रमेसर काका अपनी मुड़ी पर से गोबरे के खाँचि उतारि के उहवें ध देहने अउर चिरउरी भाव से हमसे कहने, "बाबू, हमरी लइका के इंटर फाइनल के इंतिहान आ गइल बा। तनि तूँ समय निकालि के हप्ता में एक-आध घंटा ओके पढ़ा देतS त बहुते बढ़िया रहित।" रमेसर काका की एतना कहते हम कहनी की ए काका ए बेरा तूँ खेत्ते में जा तारS त जा, हम साझीखान तोहरी घरे आ के तोहसे बतिया लेइबि। रमेसर काका फेन से गोबरे के खाँची अपनी मुड़ी पर उठवने अउर उदास मन से खेत्ते की ओर चलि देहने।
अब हम गाँव में आगे बढ़नी अउर बहोरन काका की दुआरे पर पहुँचि गइनी। बहोरन काका की दुआरे पर गाँवभरी के कम से कम 25-30 जाने लोग-लइका जमा रहे लोग अउरी किरकेट के बाति सुरु रहे। हमके देखते बहोरन काका बड़ी परेम से कहने, "आउ बाबू आउ। बइठु।" हमहुँ जा के चउकी पर बइठि गइनी। बहोरन काका हमरी ओर देखि के कहने, "बाबू, बिहाने-बिहाने कवनो जरूरी काम से एन्ने आइल बाड़S का?" हम तनि हिचकिचइनी अउर कहनी, "ना काका, कवनो जरूरी काम त ना रहल ह पर देखते बाड़S गाँव में बिजुरी के अकाल पड़ल बा। आजु भारत के किरकेट बा। काहाँ देखल जाई समझ में नइके आवत।" हमार इ बाति सुनिके बहोरन काका कहने की बाबू हमनी जान के भी त इहे चिंता खाए जाता। आखिरकार लागता की किरकेट देखे के ना मिली।
हमनीजान के आपस में इ बातचीत सुरुवे रहे तवलेकहीं चिल्लर भाई उहाँ आ गइने अउर कहताने, "दू मरदवा लोगन। काँहे परसान बाड़S जा हो। किरकेट जरूर देखे के मिली हाँ पर...." हम कहनी, "चिल्लर भाई, का हँ....खुलि के कहS न।" चिल्लर भाई कहने की सब केहु पँचि-पँचिगो रूपया निकालो अउर हम जातानी पथरदेवा से एगो बैटरी ले के आवतानी। ओ से हमार छोटकी टिविया त खूब आराम से चलि जाई। चिल्लर भाई की एतना कहते त सबके चेहरा पर मुस्कान फइलि गइल अउर सबसे पहिले बहोरने काका अपनी धोती की गाँठ में से दस रूपया के नोटि निकालि के चिल्लर भाई की ओर बढ़वने अउर कहने पाँचिगो ना दसगो ले लS हमसे। सुरती खाए के धइले रहनी हँ.....सुरती ना खाइबि तब्बो चलि।
बरोहन काका की हाथे में से उ दस रूपया के नोटि अबहिन चिल्लर भाई लेबहीं जात रहने तवलेकहीं घर में भुनभुनात बहोरनी काकी निकलली अउर दउड़ि के उ दस रूपया के नोटि बहोरन काका की हाथे में से ले लेहली। इ सब एतना जल्दी भइल की उहाँ बइठल लोग कुछ समझ ना पावल।
पइसा लेहले की बाद बहोरनी काकी बहोरन पर चिल्लइली, "लइका की लगे पेन नइखे त कहाता कि बाद में किनाई, पइसा नइखे अउर किरकेट के सुरि एतना बेधले बा की गाँठि में से पइसा निकला गइल।" एतना कहले की बाद बहोरनी काकी चिल्लर भाई की ओर घुमली अउर घोंघिअइली, "का रे चिल्लरा। तोरा त कवनो काम-धाम नइखे। दिनभर घूमि-घूमि के टाइम पास करे के बा अउर राजनीति की नाव पर नेतन से 10-20 रूपया ऐंठी लेबे के बा।"
एकरी बाद हमार नंबर रहे। काकी हमरी ओर घूमली अउर कहली, "ए बाबू, हम त सुनले रहनी हँ कि तूँ पढ़ल-लिखल बाड़S। पर हम का जानी की तोहार पढ़ल-लिखल सब बेकार बा। कहाँ ले कुछु अच्छा काम करबS त तू हूँ किरकेट देखे खातिर एकदम बेचैन बाड़S। का इ किरकेट खाए के दी?" एकरी बादो बहोरनी काकी चुपइली ना अउर आगे कहली, "पूरा देस में एहींगा भस्टाचार वेयाप्त बा। अमीर गरीब के लूट रहल बा। कानून लंगड़ हो गइल बा। केहू की घर में अनाज-पइसा सड़ता अउर केहू खइले-खइले बिना मुअता। चारू ओर अँधेर मचल बा।" एकरी बाद त बहोरनी काकी काली की रूप में आ गइली अउर तड़पली, "इ नेतो मुआ चाहताने कुलि की देस में किरकेट होत रहो अउर लोग एही के देखले में अझुराइल रहो ताकि ओ कुलि के काला-चिठ्ठा पर केहू के धेयान न जाव। उ कुलि किरकेट की नाव पर देस की जनता के पंगु बना देले बाने सन। आजु देस से बड़हन किरकेट हो गइल बा।" उ आगे बड़ी उदास होके कहली, "हमरा त लागता की इ किरकेट ससुरा त देस के ले डूबी। हे भगवान इ राम-किसन की देश में का हो रहल बा।" बहोरनी काकी की एतना कहते उनकर नतिया कहता, "ईया-ईया, किलकेट ना किलकेट के ढाल बना के नेता अउर अधिकारी ए देस के ले डूबिहें कुलि।'
अब हमरी लगे ना कुछ कहे के रहे ना सुने के। हम चुपचाप उठनी अउर अपनी घर की ओर इहे सोंचत चलि देहनी की का सही किरकेट देस के ले डूबी?
---प्रभाकर पाण्डेय
सोमवार, 7 मार्च 2011
इ किरकेट ससुरा त ले डूबी देस के
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4 टिप्पणियाँ:
bahut badhiya likhale bani prabhakar bhaiya
Raj Kamal--------------------- प्रभाकर भाई, का हाल चाल बा ? अपने ठीक कह रहल बानी. ई क्रिकेट देश के निष्क्रियत के तरफ धकेल रहल बा. हा हा हा .....ऑफिस वाला लोग घरे भागे में लागल बा, छात्र के सामने किताब नईखे खुलल लेकिन टीवी खुलल बा, चाय के दूकान पर चाय पियेवाला के भीड़ कम ...
Raj Kamal--------------------- प्रभाकर भाई, का हाल चाल बा ? अपने ठीक कह रहल बानी. ई क्रिकेट देश के निष्क्रियत के तरफ धकेल रहल बा. हा हा हा .....ऑफिस वाला लोग घरे भागे में लागल बा, छात्र के सामने किताब नईखे खुलल लेकिन टीवी खुलल बा, चाय के दूकान पर चाय पियेवाला के भीड़ कम ...
Bahut hi majedar lekh likhal ba ho. aur ho Panditji.
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