भोजपुरी गीतन के आनंद लीं

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बुधवार, 11 जनवरी 2012

आईं भस्टाचार मेटावल-मेटावल खेलल जाव



पहिले त अबहिन ले हम इहे ना समझि पवनी की भस्टाचार का हS? हमरा इयादि बा एक बेर रमेसर काका से पूछले रहनीं की काका, भस्टाचार का ह? त उ बतवले रहने की ऊपरी कमाई। हमरा अजीब लागल, हम कहनी की काका अगर आफिस में 9 से 5 खटले की बाद हम 7 से 9 कुछ अउर काम करतानी त का इ भस्टाचार हS। रमेसर काका हँसने अउर कहने की ना रे बुरबक, अगर आफिसे आवर में ते के हू से घुस लेके कवनो काम करतारे त उ भस्टाचार ह अउर हँ अगर साथे-साथे आफिसे आवर में ते आफिस के काम न क के आपन कुछ काम करतारे, कहे के मतलब बा की अधिका करतारे त उ हो भस्टाचार ह।
अच्छा, अब समझ में आइल, ए ही से अधिकारी लोग आपन निजी काम खुदे न क के अपनी सहायकन (चपरासी आदि) से करवावे ला लोग, जइसे- बैंक में आपन चेक भरवावल, बिजली के बिल, दूधे, पेपरे के बिल आदी अउर साथे-साथे गरज पड़ले पर आपन तथा अपनी पूरा परिवार, सगे-संबंधी के टिकट आदि निकलवावल, लइका के स्कूले छोड़वावल।
हमरा एयादि बा एक जाने प्रिंसपल साहब रहने त उनकरी स्कूले के दु गो चपरासी त हरदम उनकी दुअरवे पर रही के गोबर-गोहथारि करे लोग अउर सेलरी स्कूले से उठावे लोग। खैर पता ना, इ भस्टाचार ह की ना।
अब आईं रऊँसा सब के एगो किसान, मजदूर की लगे ले के चलतानी, इ देखे खातिर की का इहो लोग भस्टाचार में लिप्त बा लोग आकि इ लोग जवन करता ओके भस्टाचार ना कहल जाई।
रमई काका एगो छोट-मोट किसान हउअन। एकदिन उनकरी घरे गइनी त पता चलल की उ गोदामें पर खादि-बिया लिआवे गइल बाने पर बाद में पता चलल की उ गोदामे पर ना सचिव की घरे गइल रहने ह अउर दु-चार सौ अधिका दे के रातिए-रात 10-12 बोरा खादि अउर बिया उठा के लिया के भुसउला में ध देले बाने। उनके कहनाम रहे की के लाइन लगा के खाद-बिया निकाली। एक दिन उ 20-25 हजार रूपया घुस दे के अपनी पतोहा के आँगन-बाड़ी में नोकरी दिउआ देहने अउर आँगन-बाड़ी की नाव पर सरकार से जवन कुछ भी मिलेला बेंची देने। जब केहू चेंकिंग करे आवेला (उ इ पहिलहीं पतो क लेने की के आवता) त खिया-पिया दीहें अउर अगर अधिकारी घुसखोर नइखे त ओई दिन गाँवभरी की लइकन के दुआरी पर जुटिया लीहें अउर उनकर पतोहा पढ़ावल सुरू क दीहें। एतने ना अउर सुनी, रमई काका की छोटका लइकवा घनेसरा के दसवीं के इंतिहान रहे, जानतानी रमई काका का कइने? अरे उ पाँचि हजार रूपया ले जा के विद्यालय में दे अइने, उनके फकचोन्हर लइका घनेसरा फस क्लास से हाईस्कूल पास क लेहलसि।
एक दिन के बाति ह कि घुरहू काका की लगे गइनीं अउर कहनी की ए काका, एक दिन आके तनि हमार खोंपवा छा देतS, तोहके तोहार मजदूरी दे देइबि त उ हँसने अउर कहने की ए बाबू काहाँ समय बा, नरेगा में काम करतानी, उ हो का करेनी की तनि देहिं-ओहीं दोला देनी बस। जवने दिन अधिकारी आवेला ओही दिने तनि मेहनति करे के परेला बाकि दिन त राम के राज बा। एक दिन हमरा इहो पता चलल की घुरहू काका अपनी घरवें रहने अउर ओ दिन के मजदूरी भी उनके मिली गइल पर हाँ एकरा खातिर उनकरा ओही दिन के आपन आधा मजदूरी अपनी ऊपरवाला आदमी के देबे के परल। खैर कुछु होखो, घुरहू काका त बहुते खुस रहने।
अब आईं एगो नाया-ताजा समाचार बतावत बानी। एक दिन बटेसर भाई अइने। तनी नेताटाइप आदमी हँउअन पर अपना के बहुत पाक-साफ समझेंने अउर गाँधीजी के भक्त हउअन। आवते कहताने की ए बाबू, चलS, दिल्ली चलल जाव। त हम कहनी की बटेसर भाई कुछ जरूरी काम बा का? त कहने की भस्टाचार हटावे के बा अउर ए से जरूरी काम का होई। चलS, अन्ना हजारे बाबा की सपोट में चले के बा अउर उनकरी अनसन में भाग लेबे के बा। हम कहनी की भाई हमरी लगे अबहिन पइसा-ओइसा नइखे त उ झट से कहताने की अरे भाई! पइसा-ओइसा का होई, चलS गाँव से अन्ना बाबा के सपोट करे खातिर कुछ धान-गोहूँ असूला जाव अउर ओही से आपन खरचा-बरचा आराम से चलि जाई अउर एकहगो गाँधी टोपी पहिन लेहल जाई। जब टरेने में बिना टिकट रहले पर टीटी लोग टिकट माँगी त कहल जाई, "बाबा अन्ना, संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।"
हँ अब एगो बाति क्लियर हो गइल अउर ऊ इ कि भस्टाचार के भी कई गो परकार बा अउर भस्टाचारी लोगन के भी, बस अपना के ओमें से एगो में फिट कइले के ताक बा।
कुछ दिन पहिले हम एगो लेख लिखले रहनी, ओमें से कुछ लाइन फेर इहाँ दे तानी।
"हम बदलेंगे, युग बदलेगा।" त पहिले अपनी आप में बदलाव लाईं। केहू पर अंगुरी उठवले की पहिले अपनी गिरेबाँ में झाँकि के देखीं की रउआँ जवन करतानी उ कहाँ ले सही बा।

जय हिंद, जय भारत।।

-प्रभाकर पाण्डेय

बुधवार, 4 जनवरी 2012

हे सूरूज भगवान...सुन लS बीनती हमार

एगो गँवई किसान सूरूज भगवान के जल देत का कहता....सुनीं....


हे सूरूज भगवान, तूँ चउबीसो घंटा उगल रहS। काहेंकि कोटेदार माटी के
तेल ब्लैक में बेंची देता, घर में माटी के तेल नइखे त दिया कवनेगाँ बराई।
गाँव में लाइन के तार त दउरी गइल बा पर बिजरी बुजरी 10-10 दिन ले
गायबे रहतिया..कबो आवतो बिया त भुक-भाईं क के चलि जा तिया।
अउर सबसे बड़हन बाति इ बा की अगर तूँ 24सो घंटा उगल रहबS त हम 
24सो घंटा काम क के अपनी बाल-बच्चन के रूख-सूख दुनु टाइम त खिया 
पाइबि...एगाँ कबो-कबो उपासे कटि जाता।


-प्रभाकर पाण्डेय

बृहस्पतिवार, 22 दिसम्बर 2011

सासु तीरथ, ससुरा तीरथ....

नया कुर्ता- पियरी धोती, काँधे पर गमछा, गोर में चमड़उआ जूता अउर मुँह में पान चबात, पिच-पिच थूकत जब रमेसर काका चलने त खदेरूआ टोकलसि, "जा झारि के, रमेसर काका, जा झारि के।" खदेरूआ के बाति सुनि के रमेसर काका मन ही मन मुस्किअइनें अउर कहने, "का हो बेटा खेदारू, बड़ी चुटकी ले तारS।" एक पर खदेरूआ कहलसि, "चुटकी नइखीं लेत काका! आजु खूब झरले बाड़S, लागता कवनो नवका पहुनाई जा तारS?" रमेसर काका कहने, "हँ बुरबक, आजु समधिआने के चढ़ाई बा। कई बेर उहाँ से बोलाहट आइल ह पर काम में एतना अझुराइल रहनी हँ की मवके ना मिलत रहल हS। होत-जात, होत-जात आजु तइयारी होइए गइल।" इहे कहत अउरी धोती सरियावत रमेसर काका आगे बढ़ि गइने।


जब रमेसर काका आँखि की ओझल हो गइने त खदेरूआ उनकी दुआरे की ओर बढ़ल। खदेरूआ रमेसर काका की दुआरे पर पहुँचि के हाँक लगवलसि, "ए इयार, ए इयार! केहू बा हो घर में?" घर में से रमेसरी काकी मुड़ी पर दउरी धइले निकललि अउर कहली, "का बाबू! के के जोहतारS, तोहार काका त घरे नइखें, अबे पहुनाई गइने हँ।" एपर खदेरूआ कहलसि, "हँ, रास्ता में भेटाइल रहने हँ। बाति भइल हS। अच्छा तूँ काहाँ जातारू?" रमेसरी काकी कहली, "गोनसारी जा तानी। खिचड़ी नियरा गइल बा, भूजा-ऊजा भुजाई तबे न लाई-धोंधा बँधाई। एगो लइकिनी बिया ओहू के खिचड़ी भे जे के बा।" इ हे कहत रमेसरी काकी गोनसारी की ओर चलली। खदेरूआ दउड़ि के रमेसरी काकी की मुड़ी पर से दउरी ले के अपनी मुड़ी पर ध लेहलसि अउर कहलसि, "चलS काकी, हम तोहके गोनसारी पहुँचा दे तानी। दउरिया बहुत भारी बिया।"


चाउर से भरल दउरी ले के खदेरूआ आगे-आगे चलल अउर ओकरी पीछे-पीछे रमेसरी काकी हो लिहली। कुछ दूर चलले की बाद खदेरूआ फेरू टोकलसि, "ए काकी, अउरी इयार काहाँ बाने हो, 15-20 दिन से लउकत नइखन। कहीं कमाए-ओमाए चलि गइल बाने का? ओ हू मरदवा के कुछ बुझाला ना..काम-धंधा के दिन बा...सबके बवगा होता। एन्ने रमेसर काका अकेले परेसान बाने। खेतियो-बारी करे के बा अउरी गोबरो गोहथारी अउरी ए ही में पहुनाइयो। मरदवा के कमाहीं जाए के रहल ह त खेती-बारी करा के गइल रहतें। बुझाता की सरकारी नोकरी हS? 10-15 दिन बादे गइल रहतें त का बिगड़ि जाइत?" 


खदेरूआ के बाति सुनि के रमेसरी काकी 2-3 मिनट ले त चुप रहली ओकरी बाद एगो लंबा साँस ले के बोलली, "बाबू, तोहार इयार कमाए-धमाए नइखन गइल, उ त अपनी नइहरे गइल बाने।"
 "अपनी नइहर??" खदेरूआ फेर टोकलसि।"
 "नाहीं-नाहीं, हमरी कहले के मतलब बा की ससुरारी गइल बाने। दुनु जाने मरद-मेहरारू 15-20 दिन हो गइल एक साथे गइल लोग। उनकी ससुर के कई बेर निहोरा आइल की अकसेरुआ बानी, काम-धंधा के दिन बा त तनि बबुनिया आ जाई त हाथ बँटा दी। हमार मन त एकदम ना रहे भेजे के, इहवों त बहुत सारा काम बा। पर तोहार काका भेजवा देहनें।"
"अच्छा, त इयार भउजी के पहुँचावे गइने अउरी खुदहूँ उहवें रूकि गइने।" खदेरूआ थूक घोंटलसि।


रमेसरी काकी फेरू कहल सुरू कइली, "का कइल जा सकेला। आजु-कल की लइकन के ससुरारिए घर बा। महीना में 25 दिन ससुरारी में रहतानेसन त 2-4 दिन खातिर घरे देहिं देखावे खातिर आ जा तानेसन, जइसे की पहुनाई आइल होखेंसन। घरे रहले पर एक्कोगो काम नइखे घोंटात, दिनभर चउराहा अउरी बाजारी में घूमें के बा। बाप-माई घरे काम में परेसान बा पर ओने धेयान नइखे। ससुरारी में रहल जाता अउर ओही के आपन घर मानल जाता। अब बतावS, जब एतना कुलि कइल जाई त मेहरारू कपारे पर ना चढ़ि, ए में मेहरारू के कवन दोस बा? पहिले एक-आध आदमी घर-जमाई रहे ऊ हो मजबूरी बस पर आजु त बिआह होते सब केहू घरजमाई हो जाता।"


"अच्छा काकी, तS एगो बाति बतावS, जब इयार ससुरारी गइलहीं बाने त रमेसर काका का करे उहवाँ गइने हँ?" खदेरूआ कहलसि।


"दरअसल बाबू, बाति इ बा की तोहार काका, तोहरी इयार के ले आवे गइने हँ..इहाँ से कईगो खबर भेजाइल ह पर तोहार इयार बिहने आइबि, परसो आइबि, इहे कही के टारि दे ताने। एन्ने सब काम फँसल बा।"


एतने में गोनसारी आ गइल, खदेरूआ अपनी मुड़ी पर से दउरी उतारि के उहवें ध देहलसि अउरी मन में सोंचत चलल,"सही बात बा, जबाना उल्टा हो गइल बा, पहिले लोग अपनी बेटी, पतोही के बोलावे जात रहल ह अउर अब अपनी लइका, भाई आदि के बोलावे जाता (ससुरारी से)।" 
"मरदा मनइया सीमा पर सोभे, मउगा मरद ससुरारी में.......।" इ हे गाना गुनगुनात ऊ अपनी खेत्ते की ओर चलि देहलसि। ओकरी मन में एगो अउरी बाति नाचत रहे उ इ की आजु की जबाना में दु गो रिस्तवे चलता....


अब रऊवाँ बताईं कवन-कवन?
ससुरारि अउर सढ़ुआन का?......पता ना।




-प्रभाकर पाण्डेय







मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011

पेंचर पहुना



कल्हिए रमेसर काका एगो टाली के परची दे गइल रहुअन। ऊँखी छिलवावे के रहुए ए से आजु सबेरवें ऊँखी छिलवावे खातिर पूरा गाँव की लोग के चला के हमहुँ ऊँखियारी में चलि गउँवीं। 

रउआँ सभें त जानते बानी की जेकरा एक्कोगो चउवा बा आ चाहें पलानी-ओलानी छावे के बा उ जाड़ा-पल्ला थोड़े देखेला। केतनो जाड़ा पड़त रहो लोग-लइका कंबल-ओंबल ओढ़ि के चाहें गाँती-ओंती बाँधि के ऊँखी छिले खातिर भिनसहरवे ऊँखिआरी की ओर चलि देला। गाई-गोरू के खाए खातिर गेड़ त गेड़ कुछ लोग पलानी-ओलानी छावे खातिर पतइओ बाँधि ले आवे ला। अरे एतना ना आजकल त लवना के काम भी ए पतई से चलि जाला अउर ए जाड़ा-पल्ला में तापहुँ की कामे आवेला। केतना हँसी-ठिठोली होला ऊँखी छिलले में। आनंद ही आनंद रहेला। खूब ऊँखियो चीभे के मिलेला अउर सबेरहीं-सबेरहीं पूरा गाँव का अगल-बगल की गाँवन के समाचार भी इहाँ मिली जाला। 

हँ त भवे इ की ऊँखी की खेत्ते में से हम छिलल ऊँखी ढोवा के सेक्टर पर टाली पर लदवावत रहुवीं तवलेकहीं का देखतानी की ओही जाड़ा-पल्ला में पेंचर पहुना साइकिल डुगरावत चलल बाने। अरे पेंचर पहुना के देखते त रमेसर काका ऊँखी सरिआवल छोड़ि के बोलताने, "पेंचर पहुना, राम-राम; सबेरे-सबेरे कहाँ से आवतबानी? आईं-आईं घर-गाँव के समाचार सुनाईं। एक-आध गो ऊँखि चूसीं। बड़ी दिन की बाद राउर दरसन भइल बा।" रमेसर काका के बाति सुनते पेंचर पहुना साइकिल उहवें खड़िहा देहने अउर एगो सोगहग ऊँखी उठा के लगने चूसे। हमहुँ बढ़ि के पेंचर पहुना के पँवलग्गी कइनी अउर ऊँखियारी में से थोड़े पतई लिआके उहवें बारि देहनी। 

अब पेंचर पहुना पतई तापे लगने अउर जब शरीर तनि कड़क हो गइल तS कहल सुरु कइने, "दरअसल 15-20 दिन हो गइल घर से निकलले। गाँव-जवार के लोग अउर बहुत जाने रिस्तेदार गोधना कुटइले की बादे से पीछे पड़ल बा लोग कि पेंचर पहुना तनि जवार-पथार घूमि के लइका खोजि दीं।" पेंचर पहुना की एतना कहते रमेसर काका बोलि पड़ने, "पेंचर पहुना, रउआँ हरदम पूरा जवार-पथार घूमत रहेनी अउर पूरा जवार-पथार के खबरो राखेनीं। रउरा पूरा पता होला की कहाँ कवन लइका विआह करे की जोग हो गइल बा। ए वजह से लोग रउआँ के इ सुभ काम सउँपेला।" अब पेंचर पहुना फूलि के गदगद हो गइने अउर कहने, "रमेसर बाबू, तूँ एकदम ठीक कहतारS, पर जानतारS ए से हमार बहुत नुकसान बा। आपन काम-धाम छोड़ि के हम जवार-पथार घूमि के दूसरे लोगन खातिर लइका खोजतानी अउर एन्ने हमरी घर के लोग हमरी पर रिसियाके फुल हो गइल बा।"

हमरा इयादि बा पेंचर पहुना पंदरहो दिन ना बितेला की आपन दरसन दे देने। उनकर आवा-जाई एतना लागल रहेला की पूरा गाँवभर की लोग-लइका से उनकरा परिचय बा। गाँव में धुकते लोग-लइका उनकर पँवलग्गी कइल अउर हालचालि पूछल सुरू क देला। उनकरा गाँव में ए पार से ओ पार जाए में साँझि हो जाला। बीस जाने की घरे पानी पियेने अरे भाई पियेने ना लोग पियावेला। केहू मिट्ठा के रस ले के आई त केहू भूजा-भरी अउर पेंचर पहुना केहु के ना नाहीं क पइहीं अउर बड़ी परेम से पीहें-खइहें।

अब हम रउआँ के बता दीं की हमरी गाँव में एकजाने मुसमाती रहली उनकरा एक्के जाने लइकनी रहली अउर ओ लइकनी के विआह एही पेंचर पहुना से भइल रहे। आजु न उ मुसमाती जियतारी ना पेंचर पहुना के मलिकाइन पर तब्बो पेंचर पहुना के गाँव में बहुत पूछारि बा। हँ एकबात अउर गाँवभरि के लोग-लइका-मेहरारू-ओहरारू सब केहू पेंचर पहुना के पेंचरे पहुना कहि के बोलावेला। 

पेंचर पहुना के असली नाव खमेसर शुकुल रहे पर धीरे-धीरे उ गाँव-जवार में पेंचर पहुना की नाव से परसिध हो गइने। अरे भाई आजु-कल उनकरी गाँव के लोग भी उनके पेंचरे पहुना की नाव से बोलावेला। 

उनके नाव पेंचर पहुना काहें परल एकरी पीछे एगो लंबा कहानी बा। दरअसल एकबेर का भइल की पेंचर पहुना हमरी गाँव में आइल रहने अउर ओ बेरा मुसमाती इया जिअत रहली। पेंचर पहुना 5-7 दिन हमरिए गाँवे रहि गइने। ओने उनकरी घर के लोग परेसान हो के एगो आदमी के पेंचर पहुना के बोलावे खातिर भेजल। पेंचर पहुना ओ आदमी की साथे अपनी घरे जाए के तइयार हो गइने। जब साँझि भइल त पेंचर पहुना ओ आदमी की साथे अपनी गाँवे जाए खातिर निकललने। अरे इ का ओकरी बिहान भइले फेर से गाँव के लोग देखता की पेंचर पहुना त गँवहीं में बाने। जब लोग पूछल की रउआँ त रतिएँ अपनी गाँव चलि गउँवी त एतना बिहाने-बिहाने कहाँ से उपरा गइनी हँ त ए पर पेंचर पहुना कहने की अबहिन ए गाँव से बाहरे पहुँचल रहुँवी की हमार सइकिलिए पेंचर हो गउवे अउर हमरा वापस आवे के पड़ुवे। 

खैर, अब एगो दूसर घटना सुनीं। एकबेर के बाति ह कि पेंचर पहुना की मामा के लइका हमरी गाँवे आइल रहने अउर मुसमाति इया की इहाँ ठहरल रहने। गाँव के कुछ लोग उनसे पेंचर पहुना के हालि-चालि पुछि देहल अउर इहो कहल की काफी दिन हो गइल पेंचर पहुना के दरसन ना भइल। ए पर पेंचर पहुना के ममिआउत भाई कहने की पेंचर पहुना त कल्हिएँ हमरी सथही रउरी सभ की गाँवे आवे खातिर निकलने पर उनकर सइकिलिए पेंचर हो गइल अउर उ आ ना पवने।

कुछ लोग के इ कहनाम ह कि पेंचर पहुना जानि-बुझि के अपनी साइकिल के हउवे निकालि देने अउर बहाना बना के रूकि जाने। पर खएर जवन होखो, पेंचर पहुना के गाँ-जवार के लोग सनमान से देखेला। उ भले कवनो रिस्तेदारी में 15 दिन का 1 महीना भी रुकि जाँ त उनकरी ऊपर इ कहाउत चरितार्थ ना होला, "पहिल दिन पहुना, दूसर दिन ठेउना, तिसर दिन केहु ना।" उ हरदम पहुने बनल रहेने।

खैर अब देखिं नS लागता कि आजुवो पेंचर पहुना के साइकिल पेंचर हो गइल बिया अउर ए बेरी भी पेंचर पहुना हमरी गाँव में सबकी घरे ऊँखिबवगा के रसिआव खइले की बाद, खिचड़ी के नहान भी पटनवापुले पर क के लाई-धोंधा खइले की बादे डोलिहें...अरे ना-ना, एइसन बाति नइखे, गाँव के लोगे अब उनके खिचड़ी की नहान की पहिले जाहीं ना दी।

-प्रभाकर पाण्डेय


साभार- अँजोरिया (भोजपुरिए में सब कुछ)

सोमवार, 27 जून 2011

लहसुन में गुन बहुत बा, खाईं एके रोज


राम-राम! काका, काकी, भइया, भउजी, बाबू अउर बबूनी लोग।
का होत जाता? सब बढ़िया बा नू। कल्हियाँ रमेसर काका ब भेंटा गइल रहली। अस्पताले से लौटल रहली। बतावत रहली की सुगर बढ़ि गइल बा। अरे एतने ना कोलेस्ट्रालो बढ़ि गइल बा। डाक्टर साहब खाँचीभर दवाई देले बाने खाए खातिर।

रउरो सब की आस-पास केतने काका-काकी, भाई भउजी होई लोग जे सुगर, कोलेस्ट्राल आदी से परेसान होई लोग। तँ आईं कईगो पत्रिकन, बेबसाइटन पर दिहल गइल लेखन के सार हम इहाँ प्रस्तुत करतानीं जवने में इ बतावह गइल बा की लहसुन की उपयोग से सुगर, कोलेस्ट्राल आदि के घटावल जा सकेला अउर ए बेमारियन से छुटकारा पावल जा सकेला।

लहसुन में गुन बहुत बा, खाईं एके रोजो,
स्वाद त मिलबे करी, फिट रही सरीरो।

लहसुन के माया अपरंपार बा। खाली लहसुने के ना प्रकृति प्रदत्त हर एक बस्तुअन के। खैर हम इहाँ लहसुन के गुन बता रहल बानी। लहसुन खाली एगो मसाला ही ना, खाली एकर परयोग भोजन में स्वादे ले आवे खातिर ना कइल जाला, ए के खइले से केतने बेमारी लगे ना भटकेला लोग, अरे एतने ना अगर कुछ बेमारी पासो आ गइल लोग त दुम दबा के भागि जाला लोग।

प्राचीन काल से आपन पुरखा-पुरनिया लोग लहसुन के परयोग करत चलि आइल बा लोग। लहसुन में जटिल यौगिक जइसे एमीनो एसिड; कैल्सियम, पोटैशियम, जइसन खनिज; बीटामीन सी अउर बी6; फोलिक एसिड; ग्लूकोज आदि पावल जाला।

हृदय संबंधी रोगन के दूर कइले में लहसुन रामबा बा। बढ़ल ब्लड प्रेसर, सुगर अउर कोलेस्ट्राल के घटावे में इ बहुत बड़हन भूमिका निभावेला। लहसुन एलडीएल (LDL) में बढ़ोत्तरी के रोकेला अउर एचडीएल (HDL) के स्तर के बढ़ावेला जवने की वजह से हृदय ठीक से काम करेला।

लहसुन केंसर विशेषकर छाती, पेट, मूत्राशय अउर प्रोस्टैट ग्रंथि की केंसर की रोकथामों में बहुत कारगर ह। लहसुन सरीर की प्रतिरोधक छमता के भी बढ़ावेला। एतने ना गर्भिणी महिलावन खातिर भी लहसुन बहुते फायदेमंद ह पर एगो बात के सदा धेयान राखे के चाहीं- गर्भिणी महिला लोगन के लहसुन के सेवन बहुत अधिका ना करे के चाहीं, काँहे कि इ खून के पातर क देला जवने की वजह से रक्तश्राव अधिका हो सकेला।

लहसुन खइले से सबसे बड़हन नोकसान इ बा कि ए से मुँहे से बदबू आवे लागेला अउर एतने ना साँसो अउर सरीर से भी तनि बदबू पैदा होखे लागेला। बदबू से बचे खातिर एकर सेवन दूधे की साथे करे के चाहीं।

सेवन के तरीका- काँच लहसुन जेयादे फायदा करेला। त एगो काम करीं सुते जाए की समय लहसुन के 2-3गो दाना कूँचि के खा लीं।

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प्रभाकर पाण्डेय