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Saturday 14 November 2009

माई की ममता के इ मोल?


तिजहरियवाँ छाँटी काटत रहनी तवलेकहीं माई घर में से हाँक लगावत निकललि, "ए मझिलू! ए मझिलू! काहाँ बाड़S हो? अरे तनि लवना-ओवना के इंतिजाम क देतS। दिन डूबे जाता।" हम माई के बोलावल सुनि के छँटिकट्टा में से बाहर निकलनी अउरी कहनी, "माई ते काँहे चिंता कइले बाड़े। हम दुपहरिएवे में लग्गी ले के बड़की बारी में गइल रहनी हँ अउर तीन बोझा लवना तुड़ि के ले अइनी हँ। अउरी हाँ! उ लवना हम भुसउला घर में ध देले बानी।" हमार इ बाति सुनि के माई कहलसि, "अच्छा! ठीक कइलS हS। हाँ, तनि बिहने एगो अउरी काम कS दिहS, केहू के बोलवाके खोंप छवा दिहS।" हम कहनी, "ठीक बा, बिहने खोपवों छवा देइबि अउर तें कई दिन से देहरी में से गोहूँ निकालि के घाम देखावे के कहतारे, उ हो क देइबि।" हमरी एतना कहते, माई कहलसि, "अरे! हँ, गोहूँ के घाम देखावल त बहुते जरूरी बा काँहे की उ घुनाइल सुरु हो गइल बा।"


हमार अउरी माई के इ बाति चलते रहे तवलेकहिं उहवाँ घनेसर भाई साइकिल पर कइगो झोरा लटकवले आ गइने। ओ झोरन में से ऊ एगो झोरा उतारि के माई की ओर बढ़वने अउरी कहने, "लS ए काकी। तोहार तिउना-तरकारी।" हम घनेसर भाई से कहि बइठनि, "घनेसर भाई! लागता तरकुलवाँ की बाजारी गइल रहलS हS?" हमरी एतना कहते, घनेसर भाई बोलि पड़ने, "नाहीं भाई, तरकुलवाँ नाहीं पथरदेवाँ गइल रहनी हँ। आजु बिहनहीं, काकी चार-पाँचि किलो सरसों हमरी घरे दे अउवी अउरी कहि अउवी की बाबू, तनि बाजरी से कवनो निम्मन तिउना ले ले अइहS। बइसे हमरो कुछु कपड़ा-लत्ता किने बाजारी जाहीं के रहल हS त तोहरो तिउना ले ले अइनी हँ।"


घनेसर भाई की जाते, हम माई से पुछि बइठनि, "का रे माई! बिहनवे न झेमड़ा पर से दु गो लउकी, थोड़े घेवड़ा अउरी तिरोई तुड़ुवीं। ओकरी बादो तें बाजारी से तिउना मँगवले हS?" हमरी एतना कहते माई कहलसि, "तूँ जानत नइखS की बिहने बड़कू अउरी तोहार भउजी दिल्ली से घरे आवता लोग? का उहो लोग इहे गँवई तरकारी-भाजी खाई लोग? ओही लोगीं खातिर कुछ निम्मन तिउना मँगवनी हँ।" एतना कहि के माई तिउना से भरल झोरा उठवलसि अउरी घर में चलि गइल अउरी हम भँइसी के नादे पर से उकड़ा के लगनी दुहे।


भँइस दुहले की बाद हम दूध ले के घर में गइनी अउरी नदिया में दूध उझिलत समय माई से कहनी, "ए बेरी भइया से कहि के आपन आँखि बनववले की साथे-साथे एगो गैसवो किनवा लिहे ताकि चूल्हि फूँकले से तोके आराम मिलो। तोर आँखि खालि एही धुआँ-धक्कड़ की वजह से खराब भइल बा।" माई कहलसि, "अरे बाबू, बेचारू बड़कू तS खालि हमार अँखिए बनवावे खातिर भागल-भागल आवताने। तूँ उनकर चिठिया नाहीं पढ़लS का? ओ में हमार बड़कू साफ लिखले बाने की माई ए बेरी तोर आँखि बनवा देइबि अउर अगिला बेरी आइबि तS दु गो कोठरियो बनवा देइबि, आखिर कबले तोहSकुलि पलानी में रहबSकुलि।" माई जवने समय इ बाति कहति रहे ओ समय ओकरी आँखि में से खुसी के लोर चू-चू के ओकर अँचरा भिगो दे ले रहे। हमरो बुझाइल की अब हमार रोवाई रुकी ना अउर आपन आँखि पोंछत हमहूँ घर में से बाहर आ गइनी।


दूसरे दिन एकदम बिहनवे एगो रेक्सा ले के हम चउराहा पर पहुँचि गइनी अउरी भइया अउरी भउजी के बाट जोहे लगनी। ठीक आठ बजे देउरियाँ की ओर से एगो टेक्सी आ के चउरहा पर रुकलि। अब त हमरी खुसी के ठिकाना ना रहि गइल जब देखनी की ओमें से भइया अउर भाभी उतरSता लोग। अरे एतने ना, भउजी की कोरा में एगो बाबू देखि के हमार खुसी त अउर भी बढ़ि गइल काहें की हमरा मालूम ना रहे की हम काका बनि गइल बानी। हम दउरि के भइया अउर भउजी के गोर लगनी अउर ओ लोगन के बेग-ओग उठा के रेक्सा पर लादे लगनी। सामान-ओमान लदले की बाद भइया अउर भउजी रेक्सा पर बइठि गइल लोग। अउरी रेक्सहवा रेक्सा ले के गाँव की ओर चलि देहलसि। हमहुँ तीरछे दउड़त, भागत-परात घरे चलि अइनी।


रेक्सा की दुआरी पर पहुँचते भइया रेक्सा पर से उतरि गइने पर जब भउजी उतरल चहली त माई इसारा से मना क देहलसि। ऊ दउड़ि के घर में गइलि अउरी एक लोटा पानी, सेनुर-ओनुर ले के आइलि। हम समझि गइनी की माई झाक देहले की बादे भउजी के उतरे दी। छाक देहले की बाद माई दउड़ि के बाबू के भउजी की कोरा में से ले लेहलसि अउर भइजिओ के उतरे के इसारा कइलसि। भउजी रेक्सा में से उतरि के माई के गोड़ लगली अउरी एकरी बाद घर में चलि गइली। माइयो बाबू के ले के उनकरी पिछवें-पिछवें घर में चलि गइल। ओकरी बाद हम रेक्सा पर से सब सामान उतारि के घर में पहुँचा देहनी।


दु दिन की बाद के बाति हS, हम, भइया अउर भउजी दोगहा में बइठल रहनीजाँ। उहवें माइयो बाबू के तेल-बुकुवा से मिसत रहे अउरी घुघुआ-मन्ना खेलावति रहे। अचानक भउजी भइया से कहली, "गाँव में जेयादे दिन रहले के ताक नइखे। इ गँवई आबो-हवा बाबू के सूट नइखे करत। अगर इनके तबियत खराब हो जाई त का कइल जाई?" भउजी की एतना कहते माई टोकलसि, "अरे दुलहिन, इ तूँ का कहतारू? अबहिन त तोहSलोगन के अइले दुइयो-चार दिन नाहीं भइल। अबहिन हम अपनी बाबू के भरि आँखि देखियो ना पवनी, तवलेकहीं तूँ जाए-जाए हल्ला करे लगलू।" माई के इ कहल सुनि के तनि भउजी तेज आवाज में कहल सुरु कइली, "ए अम्मा, इ गाँव, घर खाए के दी? लइका के कुछु हो जाई त केहू आगे-पीछे ना आई। (तनि धीरा होके) अउरी हाँ, सहरियो में त घरवा सूने छोड़ि के आइल बानि जाँ। कहीं चोरी-ओरी हो गइल त के जबाब देई।" माई अबहिन कुछु कहो एकरी पहिलहीं भइया कहल सुरु कइने, "हाँ रे माई, तोर पतोहा ठीक कहतारी। अब त सहर में आपन खुद के मकानि बा। अबे दू कमरा उपरो बनववनी हँ। एगो गैस सिलिंडर रहल ह त गैस ओरा गइले पर तोरी पतोहा के स्टोपे पर खाना बनावे के पड़त रहल हS तS एगो अउरी गैस सिलेंडर किननी हँ। फोन लगववनी हँ। ए सब में बहुत पइसो खरच हो गइल बा। सब कुछ कीनि के खाए के बा। ए ही में लइका के बर्थडेउओ मनावे के बा। ओहू में हजार-दु हजार जइबे करी।"



भइया के इ सब बाति सुनि के हमरा रहाइल ना अउर हम पूछि बइठनी, "त का हो भइया, माई की आँखि के का होई?" हमरी एतना कहते फेन से भउजी सुरु हो गइली, "माई के आँखि बनवावल भागल जाता का? पहिले जवन जरूरी बा उ देखल जाव कि आँखि बनवावल जाव। जब सहर की घर के सब बेवस्था ठीक से हो जाई त ओकरी बाद अँखियो बनि जाई। हमनीजान इ थोरे कहतानीजाँ की आँखि ना बनी।" भइयो कहल सुरु कइने, "माई ते कवनो चिंता मति करु। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाई। अगिला बेर की अवाई में तोर अँखियो बनि जाई अउरी रहे खातिर दुगो घरो।" भइया के इ बाति सुनि के माई कहलसि, "बाबू, हमरा कवनो चिंता नइखे। कहीं रहजाS नीमने रहSजा। पर समय-समय पर घरो-गाँव के सुधि लेत रहSजा।" एकरी बाद माई हमरी ओर ताकि के कहलसि, "ए बाबू, जवन गोहूँ सुखवले बाड़S ओमें से दु बोरा कसि दS अउर हाँ दु बोरा धनवो कुटा दS। बड़कू के सहर में इ सब किनिए के खाए के पड़त होई अउरी अबहिन पइसा के अभाव बा।" माई के इ बाति सुनि के हम बोरा उठवनि अउरी चुपचाप बाहर चलि गइनी।


एकदिन की बादे का देखतानी की माई कइगो गठरी-सठरी बाँधSतिया। कवनो में मिट्ठा बा त कवनो में चिउड़ा अउरी कवनो में खटाई-अँचार। हमके देखते उ रोवाँसु हो के बोलि पड़लि, "ए बाबू, जा एगो रेक्सा बोलवले आवS अउर अपनी भइया-भाभी के चउरहा पर छोड़ि आवS, दुनुजाने तइयार हो गइल बाटे लोग।" हम चुपचाप घर में से बाहर निकलनी अउर एगो रेक्सा बोला लेअइनी। रेक्सा पर सब सामान-ओमान लादि के भइया अउर भउजी के चउराहा पर पहुँचावे खातिर चलि देहनी। चउराहा पर पहुँचि के ओ लोगन के देउरियाँ जायेवाली एगो टेक्सी में बइठा देहनी। भइया कहने, "बाबू, कवनो टेंसन मति लिहे। माई के ठीक से देख-भाल करिहे। हम फेनु जल्दिए लवटबि।" हमरी आँकि में से लोर बहे लागल अउरी हम ओ टेक्सी के तबले देखनी जबले ऊ हमरी आँखि से अन्हे ना हो गइल।


टेक्सी की अन्हे होते हमहुँ रोवाइन परान ले के घरे चलि अइनी। माई दुअरवें बइठल रहे। हम दुआरे पर पहुँचि के अबहिन भइंसी के नादे पर से उकड़ावत रहनी तवलेकहीं बहोरनो काका घूमत-घामत उहवें आ गइने।  बहोरन काका माई से पुछने, "त का हो भउजी, अब आराम बा न। सुननी हँ कि तोहार पतोहा आइल बाड़ी।" अबहिन माई कुछु कहो तवलेकहीं हम कहि बइठनि, "ए काका, भउजी अउर भइया आइल त रहल ह लोग पर अजुवे चलि गइल ह लोग।" रमेसर काका कहने, "कवनो बाति ना, पइसा-ओइसा त देइए गइल होईलोग। पहिले अपनी माई के आँखि-ओंखि बनवा दS।" हम कुछु बोलनी ना चुप्पे रहि गइनीं। हमार चुप्पी काका के सब समझा देहलसि। उ कहने, "बतावS एइसन लइका की कमइले का फायदा बा की बुढ़ापो में सुख ना मिले।" एकरी बाद अबहिन केहू कुछ बोलो तवलेकहीं घनेसरो भाई उहवाँ आ गइने अउरी आवते बोल पड़ने, "अरे रमेसर काका, एतने नाहीं कमाइल-धमाइल त दूर, जवन घर में अनाजो-पानी रहल ह ओहू के बोरा में कसि-कसि के काकी उनकरी संघवे भेजवा देहली हई। अरे ओतना अनाज बेंचाइत त एगो का इनकर दुनु अँखिया बनि गइल रहित।" अरे इ का, घनेसर भइया की एतना कहते त माई आग-बबूला हो गइल अउरी कहतिया, "ए घनेसर, तनि कम बोलS। हमार आंखि बनो चाहें नाहीं ए से तोहरा का? अरे ए बेरी ना अगिला बेर बनी। हमार बाबू लोग निमने रहे, काँहे कि उहे लोग हमार आँखि बा लोग। हमार त सहरियो में मकानि बा, अउर बतावS न ए गाँव में केकरा बा?" एतना कहते माई अंचरा की कोना से आँखि पोंछत घर में चलि गइल।


प्रभाकर पाण्डेय 'गोपालपुरिया'
आई.आई.टी. बांबे

Monday 9 November 2009

काका लोग कहिन...बंदे मातरम्


आजु सबेरवें-सबेरवें पंपुसेट ले के चउरी की खेत्ते में जाए के रहल ह. बरसा महरानी लागता रिसिआ गइल बारी अउरी नहरियो में पानी बहुत कम्मे बा. अउरी हाँ एक बाति अउर, नहरी के पानी चउरी में चढ़ावत में केतने जाने से कपरफोड़उलियो करे के परीत. मंसूरिया रेड़तिया अउर अगर ए समय ओ के पानी ना मिलल त काटि के चउअन के खिआवे के परी, एकरी अलावा कवनो चारा नइखे.

अबहिन पंसुसेटवा के पलानी में से निकाली के पोंछत रहनी हँ तवलेकहीं रमेसर काका डोल-डाल होके लवटल रहने हँ. हमके पंसुसेट पोंछट देखते रमेसर काका कहने ह की बाबू जोगानी, हम अब्बे आपन पंपुसेट चउरी में चहुँपवा के आवतानी. हमार मंसूरी त पाटलो चालू हो गइल बा. तूँ एगो काम करS अब आपन मसीन राहे दS अउर तिजहरियवा जा के हमरिए पंपुसेटवा से अपनो मंसुरिया पटा लिहS.

काका के इ बाति सुनते हम फटाफट आपन पंपुसेट फेन से खींचि के पलानी में क देहनी अउर गाइ के दुहे लगनी. गाइ के दुहते समय हम रमेसर काका से कहनी की काका तूँ हूँ हाथ-ओथ मटिया लS, अबे चाय बनवावतानी, पी के तब जइहS. काका कहने ठीक बा बबुनवा, तब रुकि जो, तनि हम दतुअनियो क ले तानी. हम कहनी ठीक बा.

गाइ दुहले की बाद हम दूध ले के घर में गइनी अउर माई से कहनी की जल्दी से चाय बना दे, रमेसरो काका दुअरवे पर बइठल बाने अउर हाँ उ दतुअनिओ कइले बाने ए से तनि मुँहें में डाले के मिट्ठा-उट्ठा दे दे. हम चाय बनवा के लेके दुआरे गइनी अउर पीछे-पीछे माई कटोरा में मिट्ठा अउर एक लोटा पानी. बहोरन काका अबे मीठा खा के पानिए पीयत रहने तवलेकहीं मास्टर काका अउर रमई काका भी पहुँचि गइल लोग. हम घर में जाके फेन से दु कप अउरी चाय ले अइनी. सब लोग उहवें खटिया पर बइठि के चाय पिए लागल ह लोग.

चाय पियते-पियत रमेसर काका कहने की इ चाय अंगरेजन के देन हS नाहिं त जब हमनीजान लइका रहनीजाँ ओ समय रस पी जाँ. काका के इ बाति सुनिके मास्टर काका कहने की रमेसर भइया, इ सब समय-समय के बाति हS. अबहिन इ हे कुलि बात होते रहे तवलेकहीं रमेसर काका, मास्टर काका से पुछि बइठने की आच्छा मास्टर एगो बाति बतावS. तूँ त बहुते देस-दुनिया घूमतारS, लइकनो के पढ़इबो करेलS, जब देखेनी तब रेडियो काने से सटवले रहे लS. हमरा इ नइखे बुझात की बंदे मातरम् पर एतना हो-हल्ला काहें होता जबकि इ त आपन रास्टीगीत हS.

रमेसर काका के इ बाति सुनते मास्टर काका गंभीर हो गइने अउर कहने की भइया, इ सब राजनीति ह, नाहीं त हमरी देखले से त जवन भी चीज, बात भारत से जुड़ल बा, ओकरी सम्मान से जुड़ल बा ओपर कवनो भी भारतवासी के गर्व होखे के चाहीं. पर इहाँ त सब उलटा-पुलटा बा अउर ओट की लालच में सरकारो कुछ नइखे करत. देस के चिंता आजु केहु के नइखे. सब दिखावा बा. अरे हमार बस चले त भारतीय संपत्ति, बात-विचार, ओ के गौरवांवित करे वाली हर एक बात आदि से खेलवाड़ करेवालन के सीधे फाँसी दे देतीं.

रमेसर काका कहने की हाँ इ त तूँ सही कहतारS की सरकार सबके खुस रखले की चक्कर में आपन करतव्य भूलि गइल बिया. अगर इहे हालि रहल त उ दिन दूर नइखे जब भारत ना अखंड भारत रही अउर ना एगो प्रभुता संपन्न देश.

रमेसर काका की चुप होखतहीं फेन से मास्टर काका कहल चालू कइने की भइया जवनेगाँ 'जन, गण, मन' के राष्ट्रगान के दरजा प्राप्त बा ओहींगाँ 'बंदे मातरम्' के राष्ट्रगीत के. जन, गण, मन' महान वेयक्ति रवींद्र ठाकुर दोवारा लिखल गइल बा अउर ए के सबसे पहिले 1911 में कांगरेस की एगो अधिवेसन में गावल गइल रहे जवने में जार्ज पंचम भी हाजिर रहने. रवींद्र ठाकुर के ए गीत में राष्ट्रीयता की साथे-साथे स्वर्गिक पुट बा जबकि 'बंदे मातरम्' के रचना महान वेयक्ति बंकिमचंद्रजी सन 1870 में कइले रहने. इ रचना आनंद मठ नामक उपन्यास में भी दिहल गइल रहे. ए गीत के बहुते मान रहे. पूरा भारतवासी ए गीत की प्रति सम्मान से नतमस्तक रहे. इहाँ तक की 1923 ले इ गीत हर जगहन पर, सब दलन की द्वारा गावल जाव. हम तहके एगो मिसाल के बाति इहो बता दीं की 1905 में बंग-भंग की खिलाफ जवन आंदोलन भइल रहे ओमें का हिंदू अउर का मुसलमान, सब लोग सामिल भइल अउर ए गीत के जोस की साथ गावल लोग.

मास्टर काका की चुप होखते रमेसर काका कहने की हमरा कहीं से इहो सुने में आइल रहे की 1923 की एगो कांगरेस की सम्मेलन में पहिला बेर मौलाना अहमद अली एकर बिरोध कइले रहने अउर उनकरी बिरोध के कारन इ रहे की इस्लाम में खुदा की बंगदी की अलावा केहू अउर के बंदगी के विधान नइखे. रमेसर काका के इ बाति सुनि के मास्टर काका तनि तैस में आ गइने अउर तनि तेज आवाज में बोलल सुरु कइने की त का हो भइया, तहरी कहले के मतलब इ बा की केहू अपनी मातृभूमि के बंदना ना क सकेला? अरे देस के, माई-बाप के, अपना से बड़हन के सब केहू सनमान देला, पूजा करेला त ए में बुराई का बा. अगर इस्लाम अल्लाह की अलावा केहू की बंदगी के इजाजत ना देला त का माइयो-बाप की चरन में त ना झुके के चाहीं. अरे माई-बाप, मातृभूमि के तूँ काहें ना ओही परम-पिता परमेश्वर की एगो रूप में देखतारS. देखेवाला देखतो बा, अउर जे भी समझदार बा, सच्चा भारतवासी बा उ ए गीत के विरोधो त नइखे करत. तूँ काहें भुला जातारS की बीर अब्दुल हमीद अपनीए घर के रहने. अरे इ त कुछ गिना-चुना स्वारथियन के काम बा. हमरी भासा में अगर कहीं त इ देसद्रोहियन के काम बा.

अरे इस सब राजनीति से प्रेरित बा आ अब हर भारतवासी के इ मालूमो हो गइल बा. एइसन जहर फइलावेवालन के अब सफलता ना मिली. पहिले के जबाना लदि गइल जब जाति-धर्म की नाम पर केतने नेता, ढोंगी पंडित, कठमुल्ला आदि आपन उल्लू सीधा करत रहे लोग. अब भारत के जनता जागि गइल बिया. अरे भइया, हम त इहो पढ़ले बानी की खिलाफत आंदोलन में भी 'बंदे मातरम्' गीत सान अउर सनमान की साथे गावल जाव अउर जिन्ना आदि नेता एकरी सनमान में नतमस्तक होखेलोग.

एकरी बाद मास्टर काका आगे कहल सुरु कइने की भइया हम तोहके 1944 में छपल एगो परकासित लेख जवन मौलाना अहमद रजा की दवारा लिखल गइल रहे सुनावतानी. ए लेख में रजाजी लिखले रहने की "हमारे कुछ मुस्लिम भाई जिन्दगी के कुछ साधारण तथ्य (जन्मभूमि का मातृभूमि रुप) को इबादत या बुतपरस्ती का नाम देकर नकारने का प्रयास कर रहें हैं. माता पिता के चरण स्पर्श, नेताओं के दीवार पर चित्र टांगना आदरसूचक है, इसे बुतपरस्ती की संज्ञा देना गलत है. मेरा निवेदन है कि इस गीत को एक पावन गीत के रुप में ग्रहण करें न कि बुतपरस्ती के रुप में." मास्टर काका आपन कहल जारी रखने की एतने नाहीं जब कवनों भी भारतवासी चाहें उ कवनो धरम के होखे जब अंगरेज सिपाहियन के लाठी खा त ओकरी मुँहे में से इहे निकले 'बंदे मातरम्, भारत माता की जय'. ओ समय माँ भारती के सपूत इहे गीत गुनगुना लोग.

मास्टर काका की एतना कहले की बाद रमेसर काका कहने की का इहो सही ह की 1937 में जब ग्यारह राज्यन में कांगरेस के सरकार के गठन भइल रहे त ओहू समय मुस्लिम लीग, ए गीत के विरोध कइले रहे? रमेसर काका के इ बाति सुनि के मास्टर काका कहने की हाँ इ बिलकुल सही ह अउर ए विरोध के देखते एगो समिति बनावल गइल जवने में जिन्ना अउर नेहरू भी रहे लोग अउर इ समिति ए गीत की खाली पहिलका दु पदन के सवीकार कइलसि. एकरी बाद 1938 की कांगरेसी अधिवेसन में खाली ए गीत के इहे पहिलका दुगो पद गावल गइल. इ गीत पूरा तरह से भारत की सनमान से परेरित बा, ए में कवनो एइसन बाति नइखे जवने से कवनो धरम या वेयक्ति विसेस के चोट पहुँचो. इ गीत त पूरा तरे भारतवाद से परेरित बा जवने की बारे में महर्षि अरबिंदो अउर गाँधीजी भी आपन राय वेयक्त क देले रहे लोग. ए गीत में भारतीय स्वतंत्रता संनग्राम के इतिहास छिपल बा अउर भारतीय सपूतन के सनमान. हर एक भारतवासी के ए के सनमान करे के चाहीं.

मास्टर काका के इ बाति सुनि के रमेसर काका कहने की मास्टर तूँ एकदम ठीक कहतारS अउरी हमरी राय से केहू भी अगर एकर खिलाफत करता त ओकरी ऊपर सीधे राष्ट्रद्रोह के मुकदमा दायर करे के चाहीं. अउर अगर समय रहते सरकार इन चीजन पर धेयान नइके देत त उ समय दूर नइखे जब सरकार की नजर में इन छोटन-छोटन बातन की चलते फेर से भारतवासियन के एगो बहुत बड़हन कीमत चुकावे के परी. अलगाववादी राजनीति पर अगर लगाम ना लागी त भगवाने मालिक बाने सबके।

बंदे मातरम्! जय माँ भारती!

-प्रभाकर पाण्डेय 'गोपालपुरिया'

Friday 6 November 2009

महुआ जीता गइल सब भोजपुरियन के (सुर-संग्राम की फाइनल के कहानी)


आजु सबेरवें-सबेरवें का देखतानी की रमेसर काका नहा-धो के हाथे में पूजा के डोलची ले के सिवथाने जा रहल बाने। उनकरी मुँहे में से बार-बार नमः शिवाय, नमः शिवाय निकल रहल बा। काका के ई रूप देखि के त हमार नीचे के परान नीचे अउर ऊपर के ऊपरे रहि गइल। हम थूक घोंटि के टोकि देहनीं की काका आजु का बाति ह? आजु सूरूज भगवान केने से निकलल बाने? तू अउरी पूजा! इ बाति हमरा हजम नइखे होत। दरअसल रमेसर काका फक्कड़ सोभाव के मनई हउअन अउरी केहू उनके कब्बो कवनो देवी-देवता की थाने मुड़ी पटकत नइखे देखले। सबेरवें उठते जवन आदमी बीना नहइले-धोवले एक थरिया चढ़ा ली अउर खेत्ते की ओर निकल जाई। आल्हा चाहें बिरहा सुने के होखे चाहें नाच-नौटंकी देखे के होखे त जवन आदमी एकदम अगवें जा के जगहि छेंका ली पर अगर कवनो धरम-करम के बाति रही उ आदमी कही की बबुनवा, नीक रही करम त का करिहें बरम। अब रउवें बताईं की अगर एइसन आदमी शिवनाम के उच्चारन करत शिवथाने जाता त केकरा ना अचंभा होई।
खैर रमेसर काका हमार बाति सुनि के खाली मुस्किअइने अउर बिना कवनो जबाब देहले शिवथाने की ओर बड़ि गइने। एन्ने हमहुँ अपनी काम-धाम में लागि गउवीं। हाँ अउर एक बात अउर बता दीं की काका के शिवथाने जात खाली हमहीं ना जे-जे भी देखुवे सबका थूक ना घोंटवुए।
शिवथाने पहुँचि के पूजा कइले की बाद रमेसर काका सबके परसाद बाँटत चलल रहुअन। इ अचंभा के बाति धीरे-धीरे पूरा गाँव में भइल गइल रहुए अउर 10-20 आदमी घुसुर-पुसुर करत उनकी पीछे-पीछे चलल रहुए।
काका जब हमरी दुआरे पर पहुँचवन त हाँक लगउअन, "ए जुगानी! कहाँ बाड़S हो? आवS, तूँ हूँ परसादी ले लS।" काका के हाँक सुनि के हम घर में से बाहर निकलुवीं अउरी परसादी लेहले की बाद एगो खटिया लिया के बिछा देहुवीं अउर काका से कहुँवी की बइठS।
हमरी खटिया बिछवते काका त हमरी मन के बाति भाँपि गउअन की हम काहें उनके बइठावतानी। खटिया पर बइठते उ हँसुअन अउर कहुअन, "बेटवा जुगानी! दरअसल जवन महुआ चैनल पर सुर-संग्राम के परोगराम आवत रहल ह ओकर नतीजा आ गइल बा अउर ए में सबसे बड़हन खुशी के बाति इ बा की ए में हर एक भोजपुरिया के जीत भइल बा। इ जीत पूरा भोजपुरिया समाज के बा ना की खाली यूपी आ बिहार के।" ई पूरा बाति काका एक्के साँस में कहि गउअन। एकरी बादो काका आगे कहल जारी रखुअन, "काल्हि 6 नवंबर के जवन सुर-संग्राम की फाइनल में जीतल प्रतियोगी के घोसना पटना में भइल उ भोजपुरिया समाज के सिर ऊँचा क देहलसि। दरअसल व्यावसायिकता के नजरि में रखि के जवन इ सुर-संग्राम दु राज्यन के बीच सुरु कइल गइल रहल ह, इ अंदरे-अंदर मनमोटाव पैदा करत रहल हS। हँ भाई हमरा त इ बुझात रहल ह कि एगो लमहर खाई खोना गइल बा। अगर इ परोगराम भले सुर-संग्राम रहित पर यूपी अउर बिहार के बीच में ना होके गायकन के बीच में रहित भले उ कवनो राज्य के रहेंकुलि पर एके राज्यन के बीच प्रचारित ना कइल गइल रहित त केतना अच्छा रहित। काँहे की ए तरह की प्रोग्रामन में संगीत के जीत ना होला, अच्छा गायकन के जीत ना होला बलकि छेत्रवाद आदि की चक्कर में कबो-कबो ओनइस, बीस पर बीस परि जाला। इ कहावत त सुनलहिं होखबS की मुराइलो हँसुआ अपनिए ओर खींचेला।"
रमेसर काका के बाति सुनि के कलेक्टराइन काकी कहली की चलीं अच्छा भइल की कम से कम भगवान महुआ टीबीवालन के सदबुद्धि त देहने जवने की चलते इ जोड़ बराबरी पर छूटल अउर दुनु प्रतिभागियन की साथे-साथे यूपी अउर बिहार के लाज रहि गइल अउर साथे-साथे पूरा भोजपुरिया समाज के।
कलेक्टराइन काकी की चुप होते रमेसर काका आगे कहल सुरु कइने की इ कार्यक्रम में आपन लालू यादो, रामविलास पासवान अउर साथे-साथे नंदकिसोर यादव भी पहुँचल रहने। भोजपुरिया मानस की सामने खूब नाच-गाना पेस कइल गइल। भोजपुरिया बिना हुर्दंगई कइले खूब आनंद लिहल लोग।
अंत में काका कहुने की हम महुआ टीबी (चैनल) की मालिक, एगो सच्चा भोजपुरिया तिवारी बाबा की सूझ-बूझ अउर विद्वता की आगे नतमस्तक बानी जवने की वजह से यूपी आ बिहार की बीच के खाई खोनइले की पहिलहीं पटि गइल।
काका आगे कहने की एही खुसी में आजु हम शिवथाने गइल रहनी हँ काँहे की ए सुर-संग्राम में अगर मौहन बाबू चाहें आलोक बाबू में से केहू एगो की जीतले के घोसना भइल रहित त भले ना हारित यूपी चाहें बिहार पर एगो सच्चा भोजपुरिया के हारि जरूर हो गइल रहित।
एकरी बाद जय भोजपुरी, जय महुआ टीबी अउर जय भोजपुरिया समाज कहत रमेसर काका उठि के अपनी घर की ओर चलि देहने।
-प्रभाकर पाण्डेय
आई.आई.टी. मुंबई

अब इयादि आवता लरिकाई


बाबूजी के डाँटल अब बरदास्त से बाहर हो गइल रहे। हम माई से कहि देहनी की बाबूजी के समझा दे, बाति-बाति पर घघोटें मति। अब हम लइका नइखीं। कहीं एइसन मति होखे कि हमरियो मुँहे में से उलटा-सुलटा न निकलि जाव। ए पर माई हमके समझावे अउर कहे की बाबू, तोहरे बाप न हउअन, तोहरी अच्छे खातिर डाँटेने। अपनी बाप की बाति के केहु बुरा मानेला का। एकरी बाद हम माइयो की बाति के अनसुना क के घर से बाहर चलि जाईं।
    रोज साँझीखान माई से कुछ रुपया-पइसा लीं चाहें झोरा में दु-चार किलो अनाजे ले लीं अउर साइकिल उठा के बाजारी की ओर निकल जाईं। बाजारी में इयारन कुलि की साथे खूब चाह-पकउड़ी कटे अउर ओन्ने से पान चबात, थूकत, खिखिआत घरे चली आईं।
    एन्ने बाबूजी अउर माई दिनभर घर में, खेत्ते में काम करे लोग। सबेरे उठि के माई चउका-बरतन करे अउरी बाबूजी चउअन के सानी-पानी अउर गोबर-गोहथारि करें। ओकरी बाद दुनु परानी कुछु रुख-सूख खा के हँसुआ, खुरपी, कुदारी उठावे लोग अउर खेत्ते की ओर निकल जाव लोग। एन्ने हम दिन उगले ले खटिया तूड़ी अउर उठले की बाद बार-ओर छारि के मटरगस्ती में लागि जाईं।
    कुछ सालन की बाद हमार सादी-विआह हो गइल। दुगो लइकन के बाप हो गइनी। एन्ने बाबूजी खटिया ध ले ले रहने अउर माई के खाँसी टोला-महल्ला की लोग के रातिभर जगवले रहे। अब का करीं कमाए गइले की सिवा कवनो चारा ना रहे। आखिर उधार-बाकी से कबले काम चलित।
    एकदिन टरेन पकड़नी अउर मुंबई चलि अइनी। इहाँ आवते जब फुटपाथे पर सुत्ते के परल अउर झाड़ा फिरे खातिर लाइन लगावे के परल त सब सेखी रफूचक्कर हो गइल। एकदिन एगो भलमानुस की किरिपा से जब एगो खोलि में रहे के इंतजाम हो गइल तब जा के जीव में जीव परल। ए खोली में हमरिए तरे दु जाने अउर पहिलहीं से डेरा डलले रहे लोग।
    एकदिन सुतले रहनी तब्बे हमरी सथवावालन में से एगो हमरी चुतरे पर एक लात बजवलसि अउर कहलसि की सरऊ, सुतले रहबS का? जो पानी भर। बुझाता अपनी बाप के घर बनवले बानेS। ओकरी एतना कहते हमार डेकार खुलि गइल अउर हम लगनी फूटि-फूटि के रोवे। ओई दिन माई-बाबूजी के बहुत इयादि आइल। घरे जाए के सोंचि लेहनी तवलेकहीं अपनी दुनु लइकन अउर मेहरी के चेहरा इयादि आ गइल अउर मन मारि के घरे जाए के पलान केंसिल क देहनीं।


    एन्ने-ओन्ने बहुत चक्कर लगवनी पर कहीं निमन काम ना मिलल। कहीं जाईं त पढ़ाई-लिखाई पूछें कुलि अउर १० फेल बतवते डाँटि के भगा देंकुलि। जब हमके ऊ डाँटेकुलि त हमरा उ दिन इयादि परे जब हमरा बाबूजी के डाँटल घोंघियाइल बुझाS अउर हम उनसे लड़े खातिर तइयार हो जाईं पर इहवाँ त हमके एगो अदना आदमी ले दुरदुरा देव। अब हमार अकल ठेकाने आ गइल रहे अउर हम हारि-पाछि के बाचमैनी सुरु क देहनी।
    कुछ सालन की बाद कुछ कमइले-वमइले की बाद जब घरे गइनी त बाबूजी अउर माइ के गोर पकड़ि के खूब रोवनी। अब हमरा आपन लइकाई अउर माई-बाप के दुलार मोन परे। एकदिन माई कहलसि की बाबू जवन बीति गइल ओके भुला जा अउर अब अपनी लइकन के ठीक से पढ़ावS-लिखावS अउरी अपनी कंटरोल में राखS। हम कहनी की हँ रे माई, अब जवन गलती हमसे हो गइल बा उ लइकन से ना होई अउर गँउवे में छोट-मोट रोजगार क के हम लगनी अपनी लइकन के पढ़ावे अउर घर के खरचा चलावे।
    प्रभाकर पाण्डेय,
    आई.आई.टी. बांबे

Monday 2 November 2009

टास जीतला की बादो मैच हारि गइल इंडिया


अबहिन बहुत भिनसार रहुए तब्बे का देखतानी की बहोरन काका डोल-डाल कS के लवटल बाने। ओ समय हम गोबर-गोहथारि करत रहुवीं। बहोरन काका जब नलका पर लोटा माँजत रहुअन तब्बे हमहुँ हाथ धोवे पहुँचि गउवीं। हमके देखते बहोरन काका कहताने की बाबू तनि एगो नीबी के दतुअन टूड़ी के दे दS अउर तनि दू लोटा पनियो चला दS। तनि हम दतुअन क के नहा-धो लीं।

एकरी बाद हम बहोरन काका के एगो नीबी के दतुअन दिहुवीं अउरी पूछि बइठुवीं की का बाति ह काका, आजु बहुत सबेरवें नहान-धोवान होता। लागता कहीं सबेरवें-सबेरवें जाए के तइयारी बा। हमार बाति सुनी के बहोरन काका कहताने की नाहीं बाबू, कहीं जाए के तइयारी नइखे। आजु हमरा हयट्रिक देखे के बा। हम कहनी, "हैट्रिक?" हमरी एतना कहते बहोरन काका कहने की दुर्र बुरबक....बकलोले हउअS का? कवने दुनिया में रहेलS तूँ? आजु जानत नइखS की इंडिया अउर कंगारुअन के मैच बा। हम कहनी की काका मैच त बा पर डे-नाइट। सबेरे-सबेरे नइखे। दू-ढाई बजे सुरु होई। हमरी एतना कहते बहोरन काका की देहीं में उछन्नर बरि गइल अउर कहने की ए कुलि के दिने में रखले में कवन परेसानी बा खैर जायेदS अब चलतानी टीबी खोलि के बइठबS तनि समाचार-ओमाचार सुनबि।

एकरी बाद बहोरन काका नहा-धोके अपनी घरे चलि गइने।

ढाई-तीन बजे की लगभग मैच देखे खातिर हमहुँ बहोरन काका की घरे पहुँचि गउवीं। उनकी असोरा में बहुते भीरि रहुए अउर मैच सुरु रहुए। दरअसल गँउअन में लाइन के कवनो ठिकाना त बा ना, ए से बहोरन काका का करेने की अपनी टेक्टर की बैटरिये से आपन छोटकी टीबी चालू करावे ने ताकि मैच देखले में कवनो वेवधान मति पड़ो।

हमरी पहुँचते बहोरन काका कहने की आवS बाबू आवS, बइठSSS। वइसे अब मैच हाथ से निकली गइल बा। हम कहनी की उ काहें ए काका? ए पर बहोरन काका कहने की बाबू जोस में होस नाहीं खोवे के चाहीं। अरे पिछला मैच तूँ चोटिया के जीती गइलS एकर मतलब त इ ना भइल की सब मैच तूँ चोटिया के जीतिए जइबS। इ हो त सोंचे के चाहीं की ओकरी पहिलका मैच में कवनेगाँ दनादन लगभग साढ़े तीन सौ रनन के पहाड़ बना के तूँ मैच के अपनी कब्जा में क लेले रहलS। अब बतावS तहरी लगे बल्लेबाजन के एगो लमहर फउज बा त टास जीतला की बाद बल्लेबाजी काहें ना कइल हS। काँहे की तूँ इहो जानतारS की ए मैदान में 10गो मैच पहिले बल्लेबाजी करेवाली टीम जीतल बिया जबकि 5 मैच चोटियावेवाली।

इ बात कहत समय काका की चेहरा पर गुस्सा के भाव साफ नजर आवत रहुए। उनकर खीझ उहवाँ बइठल लइकन पर निकलत रहुए। खैर हम काका की बाति से ना पूरा सहमत रहुवीं ना असहमत काहें कि हमरा किरकेट के क..ख..ग..घ.. मालूम नइखे। हम चुपचाप बइठि के किरकेट के आनंद लेबे लगुवीं।

हाँ इ अलग बाति बा की हमनीजान के हारी के मुँह देखे के पड़ुवे।



-प्रभाकर पाण्डेय